जलियांवाला बाग हत्याकांड 10 अप्रैल, 1919

जलियांवाला बाग हत्याकांड 10 अप्रैल, 1919 को अमृतसर में सत्याग्रहियों पर गोली चलाने तथा अपने नेताओं डॉ. सत्यपाल एवं सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के खिलाफ टाउन हॉल और पोस्ट ऑफिस पर हमले किए गए और इस दौरान हिंसा भी हुई। नगर का प्रशासन जनरल डायर के हाथों में सौंप दिया गया। द्वाया ने जनसभाएँ आयोजित करने पर प्रतिबंध लगा दिया।
13 अप्रैल, 1919 को बैशाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया। सभा में भाग लेने वाले अधिकांश लोग आस-पास के गाँवों से आये हुए ग्रामीण थे जो वैशाखी मेले में भाग लेने आये थे तथा सरकार द्वारा शहर में आरोपित प्रतिबंध से बेखबर थे।
जनरल डायर ने इस सभा के आयोजन को सरकारी आदेश की अवहेलना समझा तथा सभा स्थल को सशस्त्र सैनिकों के साथ घेर लिया। डायर ने बिना किसी पूर्व चेतावनी के सभा पर गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया। आँकड़ों के अनुसार 379 लोग मारे गए थे जबकि वास्तव में यह संख्या कहीं अधिक थी।
हंटर आयोग के सामने डायर ने दुःख व्यक्त किया कि उसका गोला-बारूद खत्म हो गया था एवं संकरी गलियों में बख्तरबंद गाड़ी नहीं ले जा सका।
हत्याकांड के परिणाम
इस घटना में 379 लोग मारे गये, जिसमें युवा, महिलाएँ, बूढ़े, बच्चे सभी शामिल थे। जलियांवाला बाग हत्याकांड से पूरा देश स्तब्ध हो गया। बहशी क्रूरता ने देश को मौन कर दिया। पूरे देश में बर्बर हत्याकांड की भर्त्सना की गयी।
गाँधी जी ने बोअर युद्ध (दक्षिण अफ्रीका) के दौरान की गयी सहायता के लिए मिले ‘कैसर-ए-हिन्द स्वर्ण पदक को वापस लौटा दिया। बाद में पंजाब में हुई क्रूरता से संबंधित हंटर आयोग ने शासन के पक्ष को सही ठहराया गया था।
रवीन्द्रनाथ टैगोर ने विरोध स्वरूप अपनी नाइटहुड की उपाधि त्याग दी तथा शंकरन नायर ने वायसराय की कार्यकारिणी से त्यागपत्र दे दिया।

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